पावर परचेज़ एग्रीमेंट (PPA) वह कॉन्ट्रैक्ट है जो सोलर बिजली की हर यूनिट की क़ीमत और डील की अवधि तय करता है। थर्ड-पार्टी PPA में डेवलपर प्लांट में पैसा लगाता है, उसे बनाता है, मालिक रहता है और रखरखाव करता है, और आप सिर्फ़ बिजली ख़रीदते हैं।
कॉन्ट्रैक्ट में क्या तय होता है
- प्रति यूनिट क़ीमत, स्थिर या हर साल तय रक़म से बढ़ने वाली
- अवधि, कमर्शियल और इंडस्ट्रियल सोलर में आमतौर पर 15 से 25 साल
- कौन-सी ग्रिड फ़ीस कौन देगा, और राज्य उन्हें बदले तो क्या होगा
- कम से कम ख़रीद की शर्त और जल्दी बाहर निकलने पर पेनल्टी
ग्रुप कैप्टिव से तुलना
| थर्ड-पार्टी PPA | ग्रुप कैप्टिव | |
|---|---|---|
| आपका निवेश | कोई नहीं | प्लांट में 26% इक्विटी |
| क्रॉस-सब्सिडी और अतिरिक्त सरचार्ज | दोनों देने पड़ते हैं | ज़्यादातर राज्यों में छूट |
| आम लैंडेड कॉस्ट | ज़्यादा | ₹1.50 से ₹2.00 प्रति यूनिट कम |
| किसके लिए सही | जो पूँजी नहीं लगाना चाहते | बड़े, स्थिर लोड और निवेश के लिए पूँजी वाले |
उदाहरण
एक कोल्ड स्टोरेज कंपनी बिना किसी शुरुआती ख़र्च के ₹3.90 प्रति यूनिट पर 20 साल का PPA साइन करती है। ज़्यादा सरचार्ज वाले राज्य में उसकी लैंडेड कॉस्ट लगभग ₹6.40 आती है, जो ₹9 की ग्रिड क़ीमत से काफ़ी कम है। ग्रुप कैप्टिव डील इसे और घटा देती, लेकिन उसके लिए प्लांट में निवेश करना पड़ता।
साइन करने से पहले क्या देखें
सिर्फ़ PPA क़ीमत नहीं, लैंडेड कॉस्ट माँगें, और देखें कि राज्य सरचार्ज बढ़ाए तो जोखिम किसका होगा। यही शर्त तय करती है कि पूरी अवधि में आपकी बचत बनी रहेगी या नहीं।
इन्हें भी देखें: ग्रुप कैप्टिव, लैंडेड कॉस्ट।
स्रोत
आँकड़े आख़िरी बार चेक किए गए: 26 सितंबर 2026.