मुख्य बातें
- नेट मीटरिंग में छत से बची बिजली ग्रिड को जाती है और बाद में यूनिट के बदले यूनिट वापस मिलती है। आप सिर्फ़ अंतर का पैसा देते हैं, साथ में फ़िक्स्ड चार्ज।
- बची यूनिट एक बैंक में जमा होती हैं, जिसका हिसाब ज़्यादातर राज्य साल में एक बार, आमतौर पर मार्च में, करते हैं। जो बचा उसका पैसा कम रेट पर मिलता है, महाराष्ट्र में 2026–27 के लिए ₹2.82 प्रति यूनिट।
- साल आमतौर पर अप्रैल से मार्च चलता है, इसलिए सर्दियों की बची यूनिट अगली गर्मी के AC बिल में काम नहीं आतीं। सिस्टम छत के हिसाब से नहीं, साल भर की खपत के हिसाब से लें।
- नेट मीटर DISCOM के हिसाब से लगभग ₹3,000 से ₹8,000 का पड़ता है। 10 kW तक के सिस्टम के लिए टेक्निकल फ़ीज़िबिलिटी स्टडी नहीं लगती।
नेट मीटरिंग वह व्यवस्था है जिसमें छत पर सोलर वाला घर बची बिजली ग्रिड को भेजता है और उसका क्रेडिट बाद में ली गई बिजली में घटता है। पुराने मीटर की जगह दोतरफ़ा नेट मीटर लगता है जो दोनों तरफ़ की बिजली गिनता है। बिल बनते समय DISCOM ली गई यूनिट में से भेजी गई यूनिट घटाकर पैसा लेता है। छोटी परिभाषा के लिए नेट मीटरिंग क्या है देखें। यहाँ वह सब है जो वहाँ नहीं: पूरे साल के असली आँकड़े, साल के आख़िर का हिसाब चुपचाप कैसे नुक़सान करा सकता है, मीटर का ख़र्च और उसे लगवाने का तरीक़ा।
नेट मीटरिंग बिल पर कैसे काम करती है
दिन में घर पहले सोलर की बिजली इस्तेमाल करता है। पैनल ज़रूरत से ज़्यादा बनाएँ तो बची बिजली नेट मीटर से बाहर जाती है और एक्सपोर्ट में गिनी जाती है। रात में या बादल वाले दिन आप पहले की तरह ग्रिड से बिजली लेते हैं। हर महीने DISCOM एक्सपोर्ट को इम्पोर्ट से घटाता है। एक्सपोर्ट ज़्यादा हुआ तो बची यूनिट बैंक में जाकर अगले महीनों में आगे बढ़ती हैं।
दो चीज़ें कभी नहीं हटतीं: कनेक्शन का फ़िक्स्ड या डिमांड चार्ज, और ज़्यादातर राज्यों में बिल वाली यूनिट पर बिजली शुल्क। इसीलिए नेट मीटरिंग वाला बिल उस महीने भी शायद ही ₹0 आता है जिसमें आपने खपत से ज़्यादा भेजा हो।
एक छत पर पूरे साल की नेट मीटरिंग
ज़्यादातर लेख एक महीना दिखाते हैं। एक महीने में असली बात छिप जाती है, इसलिए यहाँ महाराष्ट्र के एक घर का पूरा साल है: 3 kW सिस्टम, साल में 3,860 यूनिट की खपत, और अप्रैल से मार्च वाला हिसाब का साल, जो ज़्यादातर राज्यों में चलता है।
| महीना | सोलर से बनी यूनिट | घर में लगी यूनिट | बैंक में जमा यूनिट | बिल में आई यूनिट |
|---|---|---|---|---|
| अप्रैल | 408 | 420 | 0 | 12 |
| मई | 393 | 450 | 0 | 57 |
| जून | 276 | 380 | 0 | 104 |
| जुलाई | 222 | 300 | 0 | 78 |
| अगस्त | 249 | 290 | 0 | 41 |
| सितंबर | 279 | 300 | 0 | 21 |
| अक्टूबर | 375 | 330 | 45 | 0 |
| नवंबर | 399 | 280 | 164 | 0 |
| दिसंबर | 429 | 260 | 333 | 0 |
| जनवरी | 453 | 260 | 526 | 0 |
| फ़रवरी | 423 | 260 | 689 | 0 |
| मार्च | 447 | 330 | 806 | 0 |
| साल भर | 4,353 | 3,860 | 806 | 313 |
साल भर में पैनल ने घर की खपत से 493 यूनिट ज़्यादा बनाईं, फिर भी परिवार ने 313 यूनिट का पैसा दिया। वजह है समय। अप्रैल में बैंक ख़ाली शुरू होता है, ठीक तब जब AC सबसे ज़्यादा चलता है और मानसून उत्पादन घटा देता है। अक्टूबर में जब सोलर आगे निकलता है, महँगे महीने बीत चुके होते हैं। सर्दियों में जमा 806 यूनिट का हिसाब मार्च में सरप्लस रेट पर हो जाता है, अगले मई में काम आने के बजाय।
₹8 प्रति यूनिट मानें तो 313 यूनिट के लिए लगभग ₹2,500 दिए, जबकि 806 बची यूनिट से ₹2.82 के हिसाब से लगभग ₹2,270 मिले। यही 806 यूनिट घर में इस्तेमाल होतीं तो लगभग ₹6,450 की होतीं।
बड़ा सिस्टम कभी-कभी घाटे का सौदा क्यों है
इसी घर पर 5 kW सिस्टम लगाएँ तो यूनिट का बिल शून्य हो जाता है, पर मार्च के अंत में बैंक में 3,395 यूनिट बचती हैं। ₹2.82 पर इनसे लगभग ₹9,600 मिलते हैं। अतिरिक्त 2 kW करीब ₹1 लाख ज़्यादा का पड़ता है और उस पर पीएम सूर्य घर की कोई अतिरिक्त सब्सिडी नहीं, जो 3 kW पर रुक जाती है। यह बिल में लगभग ₹2,500 बचाता है और सरप्लस से लगभग ₹7,300 कमाता है, यानी अतिरिक्त क्षमता की वसूली में 10 साल या ज़्यादा लगते हैं, जबकि पहले 3 kW की लगभग पाँच साल में।
नेट मीटरिंग, नेट बिलिंग और ग्रॉस मीटरिंग में फ़र्क़
हर राज्य आपकी भेजी बिजली की क़ीमत एक जैसी नहीं लगाता, और कुछ राज्य बड़े घरेलू सिस्टम को नेट मीटरिंग से नेट बिलिंग पर ले जा रहे हैं। एक ही घर और एक ही महीने का बिल तीनों तरीक़ों में बहुत अलग आता है।
| वही महीना, वही घर | नेट मीटरिंग | नेट बिलिंग | ग्रॉस मीटरिंग |
|---|---|---|---|
| भेजी गई यूनिट का मूल्य | ली गई यूनिट के बदले यूनिट | ₹2.82 प्रति यूनिट | सारी सोलर बिजली ₹2.82 पर बिकती है |
| ली गई यूनिट का दाम | ₹8 प्रति यूनिट, सिर्फ़ अंतर पर | ₹8 प्रति यूनिट, सब पर | ₹8 प्रति यूनिट, पूरी 300 पर |
| बिजली का बिल | ₹0, और 60 यूनिट बैंक में | ₹1,440 − ₹677 = ₹763 | ₹2,400 − ₹1,015 = ₹1,385 |
| बिना सोलर के मुक़ाबले बचत | ₹2,400 | ₹1,637 | ₹1,015 |
नेट मीटरिंग में भेजी गई हर यूनिट ग्रिड की पूरी यूनिट के बराबर है, इसलिए दिन में कब बिजली इस्तेमाल करते हैं, इससे फ़र्क़ नहीं पड़ता। नेट बिलिंग में धूप के समय इस्तेमाल की गई बिजली भेजने से लगभग तीन गुना क़ीमती है, इसलिए वॉशिंग मशीन, पंप और गीज़र दोपहर में चलाना फ़ायदे का है। ग्रॉस मीटरिंग में सारी बिजली DISCOM को बिकती है, और अब घरों को यह शायद ही मिलती है। साइज़ तय करने से पहले अपने राज्य के पेज पर देखें कि कौन-सा तरीक़ा लागू है।
नेट मीटर का ख़र्च
| DISCOM क्षेत्र | आवेदन फ़ीस | नेट मीटर |
|---|---|---|
| गुजरात (DGVCL, MGVCL, UGVCL, PGVCL) | नहीं | ₹3,000–4,500 |
| महाराष्ट्र (MSEDCL) | ₹500–1,000 | ₹4,000–5,500 |
| कर्नाटक (BESCOM) | ₹500 | ₹4,000–5,000 |
| दिल्ली (BSES, TPDDL) | ₹1,000 | ₹4,500–6,000 |
| राजस्थान (JVVNL) | ₹1,000–2,000 | ₹4,000–6,000 |
| उत्तर प्रदेश (PVVNL) | ₹1,500–3,000 | ₹4,500–6,500 |
| तमिलनाडु | ₹2,500–5,000 | ₹5,000–8,000 |
पीएम सूर्य घर में सिस्टम की जाँच के बाद DISCOM नेट मीटर लगाता है। कुछ इलाक़ों में मीटर और फ़ीस वेंडर के पैकेज में शामिल होते हैं, कुछ में आप सीधे DISCOM को देते हैं। वेंडर से कोटेशन पर लिखवा लें कि आपके यहाँ कौन-सा तरीक़ा है, ताकि आख़िर में मीटर का बिल अचानक न आए।
नेट मीटरिंग के लिए आवेदन कैसे करें
- सैंक्शन्ड लोड देखें। कई DISCOM सिस्टम को सैंक्शन्ड लोड तक सीमित रखते हैं। ज़्यादा चाहिए तो पहले लोड बढ़वाएँ, जिससे फ़िक्स्ड चार्ज भी बढ़ता है। बड़े सिस्टम, अक्सर 5 kW से ऊपर, के लिए थ्री-फ़ेज़ कनेक्शन माँगा जा सकता है।
- आवेदन करें। पीएम सूर्य घर में आवेदन नेशनल पोर्टल से शुरू होता है और ज़्यादातर काम वेंडर करता है। स्कीम के बाहर अपने DISCOM के रूफ़टॉप सोलर पोर्टल पर या सब-डिवीज़न दफ़्तर में आवेदन करें।
- फ़ीज़िबिलिटी। 10 kW तक के सिस्टम बिना स्टडी के टेक्निकली फ़ीज़िबल माने जाते हैं। 10 kW से ऊपर DISCOM को 15 दिन में स्टडी पूरी करनी होती है, नहीं तो मंज़ूरी मान ली जाती है।
- इंस्टॉलेशन और वर्क रिपोर्ट। वेंडर सिस्टम लगाकर पूरा ब्योरा अपलोड करता है, जिसमें पैनल के सीरियल नंबर और इन्वर्टर का सर्टिफ़िकेट होता है।
- इंस्पेक्शन और नेट मीटर। DISCOM सिस्टम की जाँच करता है, पुराने मीटर की जगह टेस्ट किया हुआ नेट मीटर लगाता है और कनेक्शन चालू करता है। उसी दिन से एक्सपोर्ट गिना जाने लगता है।
- एग्रीमेंट और पहला बिल। आप नेट मीटरिंग एग्रीमेंट पर साइन करते हैं। पहले बिल में इम्पोर्ट और एक्सपोर्ट की अलग रीडिंग ज़रूर देखें।
ये तैयार रखें: बिजली का ताज़ा बिल, पहचान और पते का प्रमाण, मकान के मालिकाना हक़ का काग़ज़ या मालिक का अनापत्ति पत्र, और सब्सिडी ले रहे हैं तो कैंसल चेक। पोर्टल का पूरा तरीक़ा स्क्रीनशॉट के साथ पीएम सूर्य घर में आवेदन कैसे करें में है।
नेट मीटर की रीडिंग कैसे पढ़ें
नेट मीटर की स्क्रीन कई रीडिंग एक के बाद एक दिखाती है। लेबल कंपनी के हिसाब से बदलते हैं, पर आपको सिर्फ़ दो नंबर चाहिए। इम्पोर्ट, जो आमतौर पर kWh-Imp, kWh (I) या कोड 1.8.0 के रूप में दिखता है, यानी ग्रिड से ली गई कुल बिजली। एक्सपोर्ट, यानी kWh-Exp, kWh (E) या कोड 2.8.0, जो आपने बाहर भेजी।
हर महीने की पहली तारीख़ को दोनों नोट करें (बाक़ी स्क्रीन का मतलब स्मार्ट मीटर रीडिंग में है)। इम्पोर्ट में से एक्सपोर्ट घटाएँ, वही महीने का नेट है। धूप वाले हफ़्ते में भी एक्सपोर्ट शून्य रहे तो मीटर शायद दोतरफ़ा रीडिंग के लिए सेट नहीं है, कुछ महीनों का एक्सपोर्ट बेकार जाने से पहले DISCOM को फ़ोन करें। कुछ राज्यों में इन्वर्टर के पास अलग जनरेशन मीटर भी लगता है। वह पैनल की बनाई बिजली गिनता है, भेजी गई नहीं, इसलिए बिल के लिए उसे न देखें।
फ़्लैट के लिए वर्चुअल और ग्रुप नेट मीटरिंग
फ़्लैट में आपके हिस्से की छत छोटी हो सकती है और आपका मीटर पैनल से दूर होता है। ग्रुप नेट मीटरिंग में एक सिस्टम का एक्सपोर्ट एक ही मालिक के कई मीटरों में बँट सकता है। वर्चुअल नेट मीटरिंग में कई उपभोक्ता, जैसे एक सोसाइटी के फ़्लैट मालिक, एक साझा सिस्टम का क्रेडिट आपस में बाँटते हैं। तेलंगाना ने नवंबर 2025 से 100 kW से छोटे सिस्टम के लिए दोनों की इजाज़त दी है, और कई राज्यों में ये ड्राफ़्ट में हैं। RWA कोई डिज़ाइन तय करे उससे पहले राज्य के नियम देख ले।
आम दिक़्क़तें और उनका हल
- एक्सपोर्ट के बाद भी बिल ₹0 नहीं: फ़िक्स्ड चार्ज और शुल्क बने रहते हैं। देखें कि यूनिट वाली लाइन लगभग शून्य है।
- बिल में एक्सपोर्ट रीडिंग नहीं: मीटर सिर्फ़ इम्पोर्ट पर सेट हो सकता है। सब-डिवीज़न से दोबारा प्रोग्राम करवाएँ।
- इंस्पेक्शन के हफ़्तों बाद भी नेट मीटर नहीं लगा: आवेदन नंबर के साथ DISCOM को लिखें, फिर उसके कंज़्यूमर ग्रीवेंस रिड्रेसल फ़ोरम में जाएँ।
- अप्रैल में बैंक घट गया: सालाना हिसाब हो चुका है। उसका पैसा क्रेडिट के रूप में आमतौर पर पहली तिमाही के किसी बिल में आता है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
सोलर सिस्टम में नेट मीटरिंग क्या है?
नेट मीटरिंग बिलिंग की वह व्यवस्था है जिसमें दोतरफ़ा मीटर छत से भेजी गई और ग्रिड से ली गई बिजली दोनों गिनता है। आपको सिर्फ़ ली गई में से भेजी गई घटाकर, साथ में फ़िक्स्ड चार्ज का बिल आता है, और बची यूनिट आगे बढ़ती हैं।
सोलर नेट मीटर कितने का आता है?
घर के लिए आमतौर पर ₹3,000 से ₹8,000, साथ में DISCOM के हिसाब से शून्य से ₹5,000 तक आवेदन फ़ीस। थ्री-फ़ेज़ मीटर महँगा होता है। पीएम सूर्य घर में देखें कि वेंडर के पैकेज में यह शामिल है या नहीं।
साल के अंत में बची सोलर यूनिट का क्या होता है?
ज़्यादातर राज्य बैंक में जमा यूनिट का हिसाब साल में एक बार, आमतौर पर मार्च के अंत में, करते हैं और रेगुलेटर के तय कम रेट पर पैसा देते हैं। महाराष्ट्र 2026–27 के लिए ₹2.82 प्रति यूनिट देता है। फिर बैंक शून्य से शुरू होता है।
नेट मीटर लगने में कितना समय लगता है?
10 kW तक के सिस्टम को फ़ीज़िबिलिटी स्टडी नहीं चाहिए, बड़े सिस्टम पर 15 दिन में फ़ैसला होना चाहिए। इंस्टॉलेशन के बाद DISCOM जाँच करके मीटर लगाता है, जिसमें इलाक़े के हिसाब से असल में लगभग दो हफ़्ते से दो महीने लगते हैं।
क्या सैंक्शन्ड लोड से बड़ा सोलर लगा सकते हैं?
कई राज्यों में नहीं। सिस्टम सैंक्शन्ड लोड तक सीमित रहता है, इसलिए पहले लोड बढ़वाना होता है, जिससे फ़िक्स्ड चार्ज भी बढ़ता है। नियम राज्य के हिसाब से अलग हैं।
क्या फ़्लैट में नेट मीटरिंग मिलती है?
हाँ, जहाँ राज्य इजाज़त देता है वहाँ ग्रुप या वर्चुअल नेट मीटरिंग से। सोसाइटी साझा छत पर एक सिस्टम लगाकर एक्सपोर्ट का क्रेडिट सदस्यों में बाँट सकती है, या कॉमन एरिया के मीटर में ले सकती है।