मुख्य बातें
- 2026 में घरों के लिए असल में तीन तरह के सेल मायने रखते हैं: मोनो PERC, TOPCon और HJT। पॉलीक्रिस्टलाइन और थिन फ़िल्म घरों के बाज़ार से बाहर हो चुके हैं।
- बाइफेशियल, हाफ़-कट और ग्लास-ग्लास अलग प्रकार नहीं हैं। ये पैनल बनाने के तरीक़े हैं, और एक पैनल तीनों एक साथ हो सकता है।
- बेचने वाला साफ़ न बताए तो भी डेटाशीट सेल टाइप बता देती है। टेम्परेचर कोएफ़िशिएंट −0.35%/°C के आसपास और पहले साल 2% नुक़सान, तो पैनल PERC है, ब्रोशर में कुछ भी लिखा हो।
- सब्सिडी वाले पैनल में भारत में बने सेल चाहिए, और देश की मंज़ूर सेल क्षमता का करीब आधा हिस्सा अब भी मोनो PERC है। इसलिए DCR पैनल के PERC होने की संभावना ज़्यादा है।
आज भारतीय घरों के लिए सोलर पैनल के तीन मुख्य प्रकार बिकते हैं: मोनो PERC, TOPCon और HJT। तीनों मोनोक्रिस्टलाइन सिलिकॉन से बनते हैं। फ़र्क़ सेल की बनावट में है, और वही एफ़िशिएंसी, गर्मी में नुक़सान और उम्र के साथ घटते आउटपुट में दिखता है। पुरानी छतों पर दिखने वाले नीले पॉलीक्रिस्टलाइन पैनल अब नए सिस्टम में लगभग नहीं लगते।
ज़्यादातर लेख यह लिस्ट देकर रुक जाते हैं। यहाँ हम यह भी बताएँगे कि डेटाशीट से प्रकार कैसे पहचानें, भारत की गर्मी हर पैनल के साथ क्या करती है, सब्सिडी वाला पैनल अक्सर PERC क्यों होता है, और बाइफेशियल व फ़्लेक्सिबल पैनल पर लोग कहाँ ग़लती करते हैं।
तीनों सेल एक नज़र में
| मोनो PERC | TOPCon | HJT | |
|---|---|---|---|
| सेल का आधार | P-टाइप सिलिकॉन | N-टाइप सिलिकॉन | N-टाइप सिलिकॉन |
| पैनल एफ़िशिएंसी | 20.5–21.7% | 22.5–23.7% | 22.5–23% |
| आम पैनल साइज़ | 530–560 W | 580–640 W | 690–760 W (बड़े पैनल) |
| हर °C गर्मी पर नुक़सान | 0.34–0.37% | 0.29–0.30% | लगभग 0.24% |
| 25वें साल में वादा किया आउटपुट | लगभग 85% | लगभग 89% | लगभग 91% |
| भारत में बने सेल (DCR) | सबसे ज़्यादा | तेज़ी से बढ़ रहे | सिर्फ़ एक कंपनी |
| कहाँ दिखता है | अब तक के ज़्यादातर सब्सिडी वाले सिस्टम | नए सिस्टम, DCR और नॉन-DCR दोनों | ज़्यादातर सोलर फ़ार्म |
मोनो PERC: भरोसेमंद पुराना घोड़ा
PERC का मतलब है Passivated Emitter and Rear Cell। सेल के पीछे एक परत होती है जो बची हुई रोशनी को वापस सिलिकॉन में भेज देती है, ताकि उसे दूसरा मौक़ा मिले। 2019 से 2024 तक भारत में यही आम पैनल था, और अब तक लगे ज़्यादातर पीएम सूर्य घर सिस्टम में यही है।
PERC सेल P-टाइप सिलिकॉन से बनते हैं, जो धूप के पहले कुछ हफ़्तों में थोड़ी ताक़त खो देता है। इसीलिए PERC की डेटाशीट में पहले साल 2% या उससे ज़्यादा गिरावट लिखी होती है। सस्ता है, आज़माया हुआ है और ज़्यादातर घरों के लिए ठीक है। इसकी कमज़ोरी गर्मी है।
TOPCon: नया स्टैंडर्ड
TOPCon (Tunnel Oxide Passivated Contact) N-टाइप सिलिकॉन पर बनता है और पीछे की बहुत पतली ऑक्साइड परत बिजली का नुक़सान घटाती है। नतीजा यह कि लगभग 540 W PERC पैनल जितनी जगह में 580 से 640 W का पैनल मिल जाता है, गर्मी में कम नुक़सान होता है और उम्र के साथ आउटपुट धीरे घटता है। भारत की ज़्यादातर नई पैनल फ़ैक्टरियाँ अब TOPCon बना रही हैं।
आपकी छत पर इसका ज़्यादा दाम वसूल होगा या नहीं, यह हिसाब हमने अलग से TOPCon बनाम मोनो PERC बनाम HJT में किया है।
HJT: दमदार, पर अभी घरों के लिए नहीं बना
HJT (हेटेरोजंक्शन) में क्रिस्टलाइन सिलिकॉन के दोनों तरफ़ अमॉर्फ़स सिलिकॉन की पतली परतें होती हैं। गर्मी को यह तीनों में सबसे अच्छी तरह झेलता है और सबसे धीरे पुराना होता है। HJT सेल अप्रैल 2026 में देश की मंज़ूर सेल लिस्ट में आए, और अभी Reliance अकेली कंपनी है।
घरों के लिए दिक़्क़त साइज़ की है। भारत में बन रहे HJT पैनल 690 से 760 W के हैं, 2.4 से 2.6 मीटर लंबे, 1.3 मीटर चौड़े और हर एक 38 से 42 किलो का। ये सोलर फ़ार्म के लिए बने हैं। तंग सीढ़ी से इन्हें ऊपर ले जाना या छोटी छत पर इनकी लाइन लगाना सच में मुश्किल है। जब तक इंस्टॉलर घर के साइज़ का HJT पैनल न दे, ऊँचे दर्जे में TOPCon ही व्यावहारिक है।
बाइफेशियल, हाफ़-कट और ग्लास-ग्लास प्रकार नहीं हैं
दुकानों की लिस्टिंग में अक्सर “मोनो PERC हाफ़-कट बाइफेशियल” या “TOPCon बाइफेशियल ग्लास-ग्लास” लिखा होता है, और कई लेख इन्हें अलग प्रकार गिन लेते हैं। ऐसा नहीं है। ये बनावट के विकल्प हैं जो सेल टाइप के ऊपर जुड़ते हैं।
- हाफ़-कट: हर सेल दो हिस्सों में कटा होता है। करंट कम होने से तारों में गर्मी कम बनती है, और पैनल के आधे हिस्से पर छाया पड़े तो नुक़सान कम होता है। आज लगभग हर पैनल हाफ़-कट है, इसलिए इसके लिए अलग पैसा देने की ज़रूरत नहीं।
- बाइफेशियल: पैनल का पिछला हिस्सा भी छत से लौटी रोशनी पकड़ता है। आपके लिए फ़ायदेमंद है या नहीं, नीचे देखें।
- ग्लास-ग्लास: पीछे प्लास्टिक की शीट की जगह भी काँच। ज़्यादातर बाइफेशियल पैनल में यह ज़रूरी है और नमी से अच्छा बचाता है, पर हर पैनल का वज़न कुछ किलो बढ़ जाता है।
डेटाशीट पढ़ें: चार लाइनें जो सेल टाइप बता देती हैं
कई बार कोटेशन में “N-टाइप” या “TOPCon टेक्नोलॉजी” लिख दिया जाता है जबकि पैनल असल में PERC होता है, या सेल टाइप लिखा ही नहीं होता। उनकी बात मानने की ज़रूरत नहीं। पैनल की डेटाशीट माँगें और ये चार लाइनें देखें।
| डेटाशीट की लाइन | मोनो PERC | TOPCon | HJT |
|---|---|---|---|
| Pmax का टेम्परेचर कोएफ़िशिएंट | −0.34 से −0.37 %/°C | −0.29 से −0.30 %/°C | लगभग −0.24 %/°C |
| पहले साल की डिग्रेडेशन | 2 से 2.5% | लगभग 1% | लगभग 1% |
| उसके बाद हर साल | 0.55 से 0.6% | लगभग 0.4% | 0.3 से 0.375% |
| बाइफेशियलिटी (सिर्फ़ बाइफेशियल पैनल) | लगभग 70% | लगभग 80% | 85 से 90% |
अगर टेम्परेचर कोएफ़िशिएंट −0.34%/°C या उससे ख़राब है और पहले साल की डिग्रेडेशन 2% या ज़्यादा, तो पैनल PERC है। दो लाइनें मेल खा जाएँ तो काफ़ी है। फिर देखें कि डेटाशीट का मॉडल नंबर कोटेशन से मिलता है, और सब्सिडी वाले सिस्टम में DCR सर्टिफ़िकेट से भी।
भारत की गर्मी हर पैनल के साथ क्या करती है
पैनल की वॉट रेटिंग 25°C सेल तापमान पर नापी जाती है। मई में भारतीय छत पर सेल हवा से 20 से 30°C ज़्यादा गर्म रहते हैं। नागपुर या जयपुर की 43°C वाली दोपहर लें तो सेल करीब 68°C पर होते हैं, यानी टेस्ट से 43°C ज़्यादा। इसे टेम्परेचर कोएफ़िशिएंट से गुणा करें, नुक़सान निकल आता है।
| पैनल टाइप | 68°C सेल तापमान पर नुक़सान | उस समय 3 kW सिस्टम पर |
|---|---|---|
| मोनो PERC (−0.35%/°C) | लगभग 15% | लगभग 450 W कम |
| TOPCon (−0.29%/°C) | लगभग 12.5% | लगभग 375 W कम |
| HJT (−0.24%/°C) | लगभग 10% | लगभग 310 W कम |
पूरे साल में यह फ़र्क़ कम हो जाता है, क्योंकि सुबह, सर्दियाँ और बादल वाले दिन काफ़ी ठंडे होते हैं। उतने ही वॉट के PERC से TOPCon साल में लगभग 1 से 3% ज़्यादा यूनिट बनाता है, राजस्थान, विदर्भ और तेलंगाना में ज़्यादा, बेंगलुरु या पहाड़ों में कम। इसी वजह से नया सिस्टम अक्सर मई में मार्च से कम बनाता है, जबकि मई में धूप ज़्यादा होती है। अपने राज्य के महीनेवार आँकड़े सोलर जनरेशन कैलकुलेटर में देखें।
सब्सिडी वाला पेच: भारत में बने सेल अब भी ज़्यादातर PERC
पीएम सूर्य घर में पैनल के सेल भारत में बने (DCR) होने चाहिए। 1 जून 2026 से ये सेल सरकार की मंज़ूर सेल लिस्ट, ALMM List-II, वाली फ़ैक्टरी से भी आने ज़रूरी हैं। जुलाई 2026 तक इस लिस्ट में करीब 31 GW सेल क्षमता थी, जिसमें लगभग 52% मोनो PERC और 33% TOPCon थी। दूसरी तरफ़ भारत की मॉड्यूल फ़ैक्टरियाँ ज़्यादातर TOPCon पर जा चुकी हैं।
मतलब, सब्सिडी वाली छत के पैनल में PERC सेल होने की संभावना उसी ब्रांड के नॉन-DCR पैनल से ज़्यादा है। DCR TOPCon पैनल मिलते हैं, पर महँगे हैं और हमेशा स्टॉक में नहीं होते। कोटेशन में TOPCon और DCR दोनों लिखे हों तो साइन करने से पहले ऊपर बताए तरीक़े से डेटाशीट जाँच लें। दोनों के दाम सोलर पैनल की क़ीमत में हैं।
घर की छत पर बाइफेशियल पैनल: क्या उम्मीद रखें
बाइफेशियल पैनल पीछे से 10 से 30% ज़्यादा बिजली के दावे के साथ बिकते हैं। ये आँकड़े तब के हैं जब पैनल सफ़ेद या हल्की ज़मीन से काफ़ी ऊँचे लगे हों और आसपास खुली जगह हो, जैसे सोलर फ़ार्म में। आम भारतीय छत इसका उल्टा है: पैनल गहरे रंग की वॉटरप्रूफ़ स्लैब के पास, पीछे बहुत कम रोशनी। वहाँ फ़ायदा आमतौर पर कुछ ही प्रतिशत रहता है।
- पक्की छत, ऊँचा स्ट्रक्चर: बाइफेशियल पर थोड़ा ज़्यादा ख़र्च ठीक है। एक मीटर या ज़्यादा ऊँचे पैनल और सफ़ेद हीट-रिफ़्लेक्टिव पेंट वाली छत से सबसे ज़्यादा फ़ायदा मिलता है।
- गहरी छत के पास लगे पैनल: पीछे से बहुत कम मिलेगा। दाम का फ़र्क़ बहुत छोटा हो तभी बाइफेशियल लें।
- टीन या शीट की छत, पैनल सटे हुए: पीछे तक लगभग कुछ नहीं पहुँचता। साधारण पैनल वही काम करेगा।
पॉलीक्रिस्टलाइन और थिन फ़िल्म क्यों पीछे छूटे
पॉलीक्रिस्टलाइन पैनल कई छोटे सिलिकॉन क्रिस्टल पिघलाकर बनते हैं। सस्ते हैं पर एफ़िशिएंसी कम, आमतौर पर 16 से 18%। सरकार की मंज़ूर मॉड्यूल लिस्ट में छत वाले पैनल के लिए कम से कम 19.5% एफ़िशिएंसी ज़रूरी है, इसलिए पॉली पैनल सब्सिडी वाले सिस्टम में नहीं लग सकते और ज़्यादातर फ़ैक्टरियों ने इन्हें बनाना बंद कर दिया।
यह शर्त और कड़ी होने वाली है। दिसंबर 2025 के MNRE ड्राफ़्ट में छत वाले पैनल के लिए 1 जनवरी 2027 से 20.5% और 1 जनवरी 2028 से 21% का प्रस्ताव है। लागू हुआ तो 20 से 20.9% एफ़िशिएंसी वाले कम वॉट के PERC पैनल नए सब्सिडी सिस्टम के लिए मान्य नहीं रहेंगे। आपकी छत पर पहले से लगे पैनल पर इसका असर नहीं।
थिन-फ़िल्म (CdTe) पैनल भारत में सिर्फ़ एक कंपनी बनाती है, और वे बड़े सोलर फ़ार्म में जाते हैं। घर के लिए ये आपको ऑफ़र नहीं होंगे।
फ़्लेक्सिबल सोलर पैनल: कहाँ काम के हैं
फ़्लेक्सिबल और सेमी-फ़्लेक्सिबल पैनल पतली, हल्की शीट होते हैं, आमतौर पर 50 से 150 W, जो मुड़ी हुई सतह पर बैठ जाते हैं। वैन, नाव, टेंट और गोल शेड की छत के लिए ठीक हैं। 2026 में IndiaMART पर छोटे पैनल ज़्यादातर ₹25 से ₹50 प्रति वॉट में दिखते हैं, साधारण पैनल से लगभग दोगुने, और वारंटी 25 साल नहीं, कुछ ही साल की होती है।
ये छत वाले सिस्टम की मंज़ूर लिस्ट में नहीं हैं, इसलिए सब्सिडी नहीं मिलती, और सपाट लगने से नीचे हवा न जाने के कारण ज़्यादा गर्म होते हैं। घर के लिए फ़्रेम वाला साधारण पैनल सस्ता भी है और कहीं ज़्यादा चलता भी है।
बाद में पैनल बढ़ाने हैं? एक स्ट्रिंग में अलग प्रकार न मिलाएँ
कुछ साल बाद सिस्टम बढ़ाएँगे तो नए पैनल शायद अलग प्रकार और वॉट के होंगे। एक स्ट्रिंग में सीरीज़ में जुड़े सारे पैनल सबसे कमज़ोर पैनल के करंट पर चलते हैं, इसलिए पुराने 540 W PERC पैनलों की स्ट्रिंग में नया 600 W TOPCon पैनल भी 540 W जैसा ही काम करेगा। इंस्टॉलर से कहें कि नए पैनल इन्वर्टर के अलग MPPT इनपुट पर या दूसरे इन्वर्टर पर लगाए, ताकि कोई सेट दूसरे को न रोके।
आपको कौन-सा प्रकार लेना चाहिए
- पीएम सूर्य घर सब्सिडी ले रहे हैं: कोई भी DCR, ALMM लिस्ट वाला पैनल। DCR TOPCon, DCR PERC से थोड़ा ही महँगा हो तो TOPCon लें।
- गर्म शहर: PERC की जगह TOPCon। राजस्थान, गुजरात, विदर्भ, तेलंगाना और उत्तर भारत में गर्मी का फ़र्क़ असली है।
- छोटी छत: जो सबसे ज़्यादा वॉट का पैनल फ़िट हो, आज के हिसाब से TOPCon।
- पक्की छत पर ऊँचा स्ट्रक्चर: बाइफेशियल ग्लास-ग्लास, अगर ज़्यादा दाम थोड़ा ही हो।
- सब्सिडी नहीं ले रहे: नॉन-DCR TOPCon में प्रति वॉट सबसे कम ख़र्च।
- छोड़ दें: पॉलीक्रिस्टलाइन, और मुख्य छत के लिए फ़्लेक्सिबल पैनल।
पैनल मॉडल आमने-सामने सोलर पैनल तुलना पर देखें।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
सोलर पैनल कितने प्रकार के होते हैं?
2026 में भारतीय घरों के लिए असल में तीन प्रकार हैं: मोनो PERC, TOPCon और HJT, तीनों मोनोक्रिस्टलाइन। पॉलीक्रिस्टलाइन और थिन-फ़िल्म पैनल मौजूद हैं पर अब घर की छत के लिए नहीं मिलते। बाइफेशियल और हाफ़-कट बनावट की ख़ूबियाँ हैं, अलग प्रकार नहीं।
भारत में घर के लिए कौन-सा सोलर पैनल सबसे अच्छा है?
2026 में TOPCon सबसे संतुलित विकल्प है। यह मोनो PERC से प्रति वर्ग मीटर ज़्यादा बनाता है, गर्मी में कम खोता है और धीरे पुराना होता है। मोनो PERC काफ़ी सस्ता मिले तो वह भी ठीक है, ख़ासकर सब्सिडी वाले सिस्टम में।
मोनोक्रिस्टलाइन और पॉलीक्रिस्टलाइन पैनल में क्या फ़र्क़ है?
मोनोक्रिस्टलाइन सेल एक ही सिलिकॉन क्रिस्टल से कटते हैं और 20 से 24% एफ़िशिएंसी देते हैं। पॉलीक्रिस्टलाइन सेल कई क्रिस्टल से बनते हैं और सिर्फ़ 16 से 18% तक पहुँचते हैं, जो सब्सिडी वाले छत पैनल की 19.5% की न्यूनतम सीमा से कम है, इसलिए ये घरों के बाज़ार से बाहर हो गए।
क्या घर की छत पर बाइफेशियल पैनल फ़ायदेमंद है?
तभी जब पैनल हल्के रंग की छत से काफ़ी ऊँचे लगे हों। आम छत पर, जहाँ पैनल गहरी स्लैब के पास होते हैं, पीछे से मिलने वाली बिजली ज़्यादा से ज़्यादा कुछ प्रतिशत होती है, इसलिए दाम का फ़र्क़ छोटा हो तभी बाइफेशियल लें।
कैसे पता करें कि पैनल TOPCon है या PERC?
डेटाशीट देखें। TOPCon पैनल में टेम्परेचर कोएफ़िशिएंट लगभग −0.29 से −0.30%/°C और पहले साल करीब 1% डिग्रेडेशन होती है। PERC पैनल में −0.34%/°C या उससे ख़राब और पहले साल 2% या ज़्यादा।
क्या फ़्लेक्सिबल सोलर पैनल पर पीएम सूर्य घर सब्सिडी मिलती है?
नहीं। फ़्लेक्सिबल पैनल छत वाले सिस्टम की मंज़ूर मॉड्यूल लिस्ट में नहीं हैं, इसलिए सब्सिडी नहीं मिलती। ये घर की छत से ज़्यादा वैन, नाव और मुड़ी सतहों के लिए हैं।